Life changing guidance of my father

It was around September 1979. I was in the final year of my engineering degree at Maulana Azad College of Technology, Bhopal, when I first noticed something unsettling. While writing, my fingers would stiffen, my grip would loosen, and the pen would slip from my hand. At first, I dismissed it as fatigue. But gradually, the problem worsened—to the point where I could barely write eight or ten words before losing control.

I consulted a doctor, who suggested that it might be a “mental knot” and advised me to experiment with unconventional grips. I tried everything suggested, but nothing helped. The condition continued to deteriorate.

In this state, I appeared for my final-year examinations in March 1980. Writing the papers was an ordeal—the pen would slip from my fingers every few words. Yet, by the grace of God, when the results were declared in June 1980, I had passed with a first division.

After that, I went to stay with my parents in Khandwa and began preparing for various competitive examinations. But internally, I felt lost and defeated, watching myself slide downhill. One must remember that in those days there was no alternative to writing for an engineer. Losing the ability to write felt like an existential crisis.

Around October 1980, my father mentioned a newspaper article he had read. It described a boy who, despite having lost both his hands, had learned to write by holding a pen between his toes. My father said quietly, “You still have both hands. Why don’t you try using the other one?”

Something about that remark struck a deep chord within me. I began practicing writing with my other hand. Slowly, painstakingly, letter by letter, control returned. The rest, as they say, is history. After about six months of dedicated practice, I found myself whole again.

सफलता की ज़िम्मेदारी

“सुई धागा” हिन्दी सिनेमा पर आधारित एक विचार मैं पहले भी आपके समक्ष रख चुका हूँ। इसी सिनेमा से प्रेरित एक दूसरा विचार रखना चाहूँगा। नायक गरीब है, और नौकरी छोड़ कर अपना सिलाई का काम शुरू करने की सोचता है। वह सरकार की मुफ्त सिलाई मशीन स्कीम में हिस्सा लेता है जिसमें समय सीमा के भीतर सिलाई का टेस्ट पास करने पर सिलाई मशीन मुफ्त मिलती है। जब सिलाई का टेस्ट होता है तो नायक किसी कारण से लेट हो जाता है। उसकी पत्नी जो सिलाई नहीं जानती है सिलाई का टेस्ट देने की कोशिश करती है पर असफल होती है। नायक किसी तरह बदहवास हालत में देर से पहुंचता है। जैसे ही वह पहुंचता है दोनों, एक नए उत्साह से, बिना देरी किए, टेस्ट देने में जुट जाते हैं और कम समय में भी टेस्ट पास कर लेते हैं और मशीन पा जाते है। यह टेस्ट उनके जीवन की दशा और दिशा दोनो को परिवर्तित कर देता है।

इसे देख कर, मुझे अपने साथ हुआ करीब 36 साल पुराना वाकया याद आ गया। तारीख थी 18 अगस्त 1982। मैं मुंबई, उस समय के बॉम्बे, में था। संघ लोक सेवा आयोग का इंजिनीरींग सर्विसेस का एक्जाम दे रहा था। इस दिन पाँचवाँ अर्थात आखिरी पर्चा था। मैं दादर में रहता था और हार्बर लाइन के सैंडहर्स्ट स्टेशन के पास परीक्षा स्थल था। मैं और मेरा एक साथी, हम दोनों दादर स्टेशन से लोकल ट्रेन से परीक्षा स्थल जाते थे। उस दिन जैसे ही दादर स्टेशन पर ट्रेन में बैठे, कुछ लोग आए उन्होने तोड़ फोड़ कर ट्रेन रोक दी। हम दोनों वहाँ से निकल कर बस में बैठे, पर कुछ दूर जाकर बस को भी रोक दिया गया। अब तक पता चल गया था कि पुलिस ने स्ट्राइक कर दी है और वो बॉम्बे बंद कर रहे हैं। बस छोडकर, टैक्सी लेकर जैसे तैसे परीक्षा स्थल पहुंचे। लेकिन जब तक वहाँ पहुंचे करीब आधा घंटा देरी हो चुकी थी। परीक्षा नौवे मंजिल पर थी। लिफ्ट के सामने पहुंचे तो लंबी लाइन थी। नौवी मंजिल तक दौड़ते हुए गए। अगस्त का महीना, बॉम्बे का मौसम, श्वासहीनता, पसीने से बुरा हाल और उस पर देरी का अहसास, हमारी ऐसी हालत देखते हुए निरीक्षक ने न केवल हमें परीक्षा देने की अनुमति दी, बल्कि पानी भी पिलाया। कुछ क्षण श्वास लेने के बाद, बिना कोई समय बर्बाद किए मैंने परीक्षा देना शुरू कर दिया। विपरीत परिस्थितयो में कम समय होने पर भी मैंने इस परीक्षा में काफी अच्छे अंकों से सफलता हासिल की।

इन दोनों वाकयों में सफलता का कारण सकारात्मक रवैया था। विपरीत परिस्थिति के बावजूद, मन में कोई शंका लाये बिना, अपनी क्षमता पर विश्वास करते हुए, परिस्थिति को स्वीकारते हुए, बिना कोई देरी किए, बचे हुए कम समय में काम पूरा करने का जज़्बा ही सफलता का कारण बने। देरी का कारण न मेरे हाथ में और न ही उस फिल्म नायक के हाथ में था, पर उस देरी से उत्पन्न हुई स्थिति से निपटना हमारे हाथ में था, जिसे हमने बखूबी किया। यही समय हम अगर देरी और उसके कारण के ऊपर ध्यान लगाने में करते तो निश्चित रूप से असफलता ही हाथ लगनी थी।

ज़िंदगी में ऐसी कई मौके आएंगे जब आपके काम या सफलता के आड़े बाहरी कारण आएंगे, जो आपके नियंत्रण से बाहर हैं। पर यह चुनाव आपको करना है कि आप इन बाहरी कारणों को दोषी ठहराते हुए अपना समय बर्बाद करें या इन पर ध्यान न देते हुए, जो आपके हाथ में है उसे करें। अगर आप बाहरी कारणों को जिम्मेदार मानेंगे, जो करना सबसे आसान है, तो आपको उस समय तो बहुत बेहतर महसूस होगा, पर इसका नकारात्मक पक्ष यह है कि इस मनोवृत्ति के साथ असफलता निश्चित है। अगर आप अपने चारों तरफ देखेंगें तो पाएंगे यही फर्क होता है शिकायती प्रवृति के लोगों में और कर्मठ लोगों में।

इन दो वाकयों के माध्यम से मैं यह विचार आपके लिए छोड़ना चाहता हूँ कि आप किस मनोवृत्ति के साथ अपनी ज़िंदगी में आगे बढना चाहेंगे – अपनी असफलता के लिए बाहरी कारणों को जिम्मेदार ठहराने की या विपरीत परिस्थितियों में भी स्वयं पर विश्वास करते हुए सफलता की और प्रयास करने की।

पति पत्नी के संबंध का मूल मंत्र

हाल ही मे मैंने हिन्दी सिनेमा “सुई धागा” देखी। इस फिल्म का नायक और नायिका शादीशुदा हैं और निचले मध्यम वर्ग के हैं। दोनों में आपसी प्रेम तो दूर की बात, एक दूसरे से मिलने या बात करने का मौका तक नहीं मिलता है। नायक एक दुकान पर नौकरी करता है और साथ में मसखरी भी करता है। दुकान के मालिक के घर पर एक समारोह में नायक से कुत्ते का अभिनय करने को कहा जाता है। वहाँ उसकी पत्नी और परिवार के लोग यह देख कर काफी दुखी होते है। तब अपनी पत्नी के बढ़ावे पर वह नौकरी छोड़ कर अपना काम शुरू करने की कोशिश करता है। इस कोशिश में काफी मुश्किलें आती हैं। पर इस उद्यम में उसकी पत्नी पूरी तरह से उसके साथ है। इस यात्रा में दोनों के बीच में पहले निकटता और फिर प्रेम शुरू हो जाता है।

फिल्म देखने के दौरान मैं सोचने लगा कि उन दोनों ने एक उद्यम पर साथ यात्रा शुरू की जिसमे दोनों अकेले हैं, सफलता की कोई निश्चितता नहीं है और कई बार ऐसा लगता है कि सभी उनकी असफलता की कामना कर रहें हैं। इस यात्रा में दोनों बीच बीच में असफल होते हैं, परेशान होते है, रोते हैं और अपने इरादे की व्यवहारिकता पर शक करते हैं। पर फिर प्रश्न उठा कि विपरीत परिस्थितयो में भी उनमें प्रेम कहाँ से आ गया।

इसी प्रश्न का उत्तर तलाशते हुए सोचने लगा कि पति पत्नी का सम्बंध भी कितना अनोखा होता है कभी  हम इसकी तुलना गाड़ी के दो पहियो से करते हैं तो कभी हम कह्ते हैं कि  पति पत्नी रेल की पटरियों के समान हैं, न मिलेंगे और न अलग होंगे। जहाँ इस रिश्ते पर जोक्स बहुत हैं तो वही साहित्य भी बहुत है।

पति पत्नी जब साथ में नयी यात्रा की शुरूआत करते हैं तो दोनों की सोच अलग अलग होती है पर दोनो एक दूसरे को जानने और समझने की कोशिश करते हैं और एक दूसरे का सहयोग करते हैं। पर सामन्यतया इस हनीमून पीरियड के समाप्त होने पर उन्हे एक दूसरे में कमियाँ नज़र आने लगती है, संबंधो में कड़वाहट आने लगती है और दूरियाँ बढती जाती हैं। दोनों के बीच का विवाद या टकराव न केवल उनकी जिंदगी को नकारात्मक रुख देता है, बल्कि उनसे जुड़े हर व्यक्ति और कई मायने में समाज को भी उसी तरीके से प्रभावित करता है।

इस फिल्म में भी नायक और नायिका के बीच न तो निकट्ता और ना ही प्रेम होता है पर जब वह साथ मिलकर अपना एक लक्ष्य बनाते हैं और उस लक्ष्य को पाने के लिए, एक बेहतर कल की आशा में, साथ काम करते हैं तो वह भावनात्मक तरीके से जुडते हैं। यह यात्रा उनके बीच पहले निकटता और फिर प्रेम को जगा देती है।

असली जिंदगी में भी हम देखें तो जब भी पति पत्नी साथ मिल कर कोई कार्य करते हैं तो उनमें तालमेल बढ़ जाता है और मतभेद कम हो जाते हैं चाहे वह काम साथ खाना बनाने या साथ संगीत का अभ्यास करने या साथ बागवानी करने जैसा छोटे काम हो या बच्चों की परवरिश या साथ व्यवसाय करने जैसा बडे काम ।

 

इसीलिये मैं यह कहना चाहूँगा कि साथ काम करना, एक ऐसा शर्तिया उपाय है, जिससे पति पत्नी के संबंधो में निश्चित रूप से मधुरता आएगी। चुनौती सिर्फ इस बात की है कि जिंदगी के विभिन्न पड़ावों पर ऐसे कार्य या लक्ष्य को पहचानने की जो दोनों साथ मिलकर पूर्ण समर्पण से करना चाहें।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

उत्कृष्ट नैतिक मूल्य – अनुपालन और लाभ

मैंने अपना प्रॉफेश्नल करियर तीन दशक पहले भारतीय रेल से शुरू किया था। शुरू से ही मैंने पाया कि नैतिक मूल्यों के पालन पर बहुत ज़ोर रहा है। जैसे ईमानदारी, सत्यनिष्ठा, विश्वसनीयता, पारदर्शिता, सरलता, सहनशीलता, विनम्रता इत्यादि।

देश के संविधान के अंतर्गत ये नैतिक मूल्य देश के सर्वोच्च पद, राष्ट्रपति के पद से लेकर सबसे छोटे पद की ज़िम्मेदारी में निहित है। राष्ट्रपति, सांसदों और संवैधानिक पदों पर जो शपथ ली जाती उसमें नैतिकता प्रमुख है। सभी सार्वजनिक और व्यावसायिक कार्यालयों में ये नैतिक मूल्य आचरण नियमों के द्वारा लागू होते हैं। अपने देश में कुछ निजी क्षेत्र के उपक्रम हैं जो उत्कृष्ट नैतिक मूल्यों के लिए जमाने से जाने जाते है। नैतिक मूल्यों के उल्लंघन पर सार्वजनिक और व्यावसायिक कार्यालयों के आचरण नियमों और देश के कानून में दंड का प्रावधान है।

लेकिन नैतिक मूल्यों के पालन पर ज़ोर एक तरफा है। यानि, नैतिक मूल्य का उल्लंघन नहीं होना चाहिए। उल्लंघन की दशा में आपके खिलाफ कार्यवाही हो सकती और परिणामस्वरूप आपका नुकसान हो सकता है। जैसे अगर आप रिश्वतख़ोरी, गलतबयानी, गैर पारदर्शिता, पक्षपात, किसी भी प्रकार का उत्पीड़न या दुर्व्यहवार करतें हैं तो आपके खिलाफ कार्यवाही हो सकती है और आपकी नौकरी तथा तरक्की पर बुरा असर पड़ सकता है। परिणामस्वरूप आपका नाम सामाजिक रूप से भी कलंकित हो सकता है।

इस तरह से सारा फोकस नैतिक मूल्यों के डाउन साइड पर है। पर नैतिक मूल्यों के अप साइड का क्या? इस दिशा में कोई सोच या कोई विचार नज़र नहीं आता है कि अगर कोई व्यक्ति नैतिक मूल्यों के पालन का उत्कृष्ट नमूना प्रस्तुत करता है तो क्या यह व्यवस्था उसे पुरस्कृत करती है।

आज हमारी व्यवस्था इसी तरह से बनी है कि हम केवल नैतिक मूल्यों के उल्लंघन को ही संबोधित करतें हैं। जैसे सतर्कता आयोग, भ्रष्टाचार रोकने के तरीके, जांच व्यवस्था इत्यादि। सभी सार्वजनिक कार्यालयों में सतर्कता विभाग होता है जिसका काम नैतिक मूल्यों के अतिक्रमण पर नज़र रखना और कार्यवाही करना है। सारा साहित्य भी इसी बात पर केन्द्रित है कि कैसे गलत करने वालों को पकड़ा जाए या कैसे गलती न करें।

आपने अपने कार्यकाल के दौरान ऐसी घटनाएँ देखीं होंगी, जब किसी व्यक्ति को रिश्वत लेने के लिए, यौन शोषण के लिए, यात्रा भत्ते में हेरफेर के लिए, या पक्षपात के लिए अनुशासनात्मक कार्यवाही का सामना करना पड़ा हो। किसी भी कार्यालय में इस तरह के कई उदाहरण होंगे जो नैतिक मूल्य के उल्लंघन करने वाले के मन में डर पैदा करेंगे। पर क्या हमारी व्यवस्था उत्कृष्ट आचरण को प्रोत्साहित कर रही है। क्या पदासीन अधिकारियों को हम प्रोत्साहित कर रहें हैं कि अगर आप उत्कृष्ट आचरण करेंगे तो आपको नौकरी और तरक्की में फायदा होगा या समाज में प्रतिष्ठा बढ़ेगी?

आज का परिप्रेक्ष्य इस प्रकार का है कि सब की सारी कोशिश रहती है कि आचरण नियमों से संबन्धित कोई गलती न करे। अगर गलती हो भी जाए तो कोशिश होती है कि पकड़े न जाएँ। गलती होने के बाद अपने आप को बचाने के लिए हेरफेर करना या झूठ बोलना भी इसी मानसिकता का परिणाम है। शायद इसी कारण हमारे देश में भ्रष्टाचार हमेशा चर्चा का विषय बना रहता है और नैतिकता के संतोषजनक स्तर तक पहुँचने का हमारा रास्ता अभी लंबा है।

जिस तरह हमारी व्यवस्था नैतिक मूल्यों के उल्लंघन को संबोधित करती है। उसी तरह से क्या हम ऐसी व्यवस्था बना सकते हैं जो नैतिक मूल्यों के उत्कर्ष पालन को भी संबोधित करे? जिस तरह मूल्यों के अतिक्रमण पर दंडित होने का डर होता है वैसे ही मूल्यों के अनुकरणीय पालन करने पर फायदे की भी आशा होनी चाहिए। जब ऐसी व्यवस्था होगी तब लोगों में उत्कर्ष मूल्यों के पालन की चाहना होगी और प्रतिस्पर्धा होगी। और ऐसी व्यवस्था में एक संतुलन भी नज़र आयेगा कि जहां मूल्यों के उल्लंघन पर नुकसान होगा वहीं मूल्यों के पालन पर फायदा होगा।

पर नैतिक मूल्यों के उत्कर्ष पालन को कैसे मापा जाय? जैसे आचरण नियम के अतिक्रमण को पकड़ना आसान होता है, नैतिकता के उत्कर्ष पालन को मापना बहुत मुश्किल है। और इस बात कि क्या निश्चितता है कि कोई व्यक्ति नैतिक मूल्यों के उत्कर्ष पालन और प्रदर्शन के बाद किसी अनियमितता में भाग नहीं लेगा। शायद इसी कारण सभी संगठन इस जोखिम से बचते हुए रुढ़ीवादी रास्ता अपनाते हैं। पर समाज में नैतिक मूल्यों की अवनीति को रोकने के लिए इस सोच में बदलाव की जरूरत है।

मेरा देश के नीति निर्माताओं से आव्हान है कि इस विषय पर विचार किया जाय और ऐसी व्यवस्था बनाने की कार्यवाही की जाय जिसके तहत हमारा देश नैतिक मूल्यों के पालन की उत्कृष्टता की ओर अग्रसर हो। एक कहावत है कि एक हज़ार मील की यात्रा भी एक कदम से शुरू होती है। इसलिए मेरा अनुरोध सभी संस्थाओं और संगठनो से है कि इस दिशा में पहला कदम लें, केवल अपने लिए नहीं, बल्कि देश और समाज के लिए।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

टहलना – सेहत और बहुत कुछ

महात्मागांधी ने कहा है कि टहलना कसरतों की रानी है। स्कूल की दीवारों पर लिखे कई महापुरुषों के विचारों मे से यह एक विचार था जिसे मैं एक तरीके से हमेशा खारिज कर देता था। मुझे समझ ही नहीं आता था कि टहलने जैसा बोरिंग और रूटीन कार्य कैसे इतना महत्वपूर्ण हो सकता है। टहलना या वॉकिंग हमारे अवचेतन मन में इस तरह से निहित है, कि हम रोज़ बिना सोचे विचारे चलते हैं, वैसे ही जैसे नहाना, कपड़े पहनना, आदि कार्यों को हम करते हैं।

कई साल बीत गए। अब यह समझ मे आया है कि वास्तव में महात्मा गांधी का विचार कितना सही था, और है। टहलना एक तरह से भानुमती का पिटारा है।

यहाँ जब हम टहलने की बात कर रहे हैं तो यह वो नहीं है जो हम रोजाना की जिंदगी में 1-2 किलोमीटर या ज़्यादा चलते हैं। यह वो टहलना है जो हम रोज़ समय निकाल कर इसी लक्ष्य के साथ करें।

ज़्यादातर लोग टहलना डॉक्टर की सलाह से शुरू करते हैं। शुरू में टहलना काफी बोरिंग लग सकता है। आपको स्वयं को वॉकिंग में डालना होगा और कुछ समय देना होगा इसे अपनी आदत बनाने के लिए। आप बगीचे में जा सकते हैं जहां हरियाली को देख कर अच्छा लगे और दूसरे लोगों को देख कर प्रेरणा भी मिले। कभी आप म्यूजिक सुन सकते हैं। किसी साथी के साथ जा सकते हैं। कोई भी समय चुन सकते हैं। शुरू में कोई भी कपड़े और चप्पल या जूते पहन सकते हैं। जो आपको ठीक लगे वो कर सकते हैं। जैसे जैसे आपका टहलना नियमित हो आप उपयुक्त कपड़े और जूते ले सकते हैं। समय के साथ आप अपनी वॉक की टाइमिंग और लक्ष्य निर्धारित कर सकते हैं। वॉकिंग के साथ जॉगिंग को जोड़ सकते हैं। या छोटी मोटी कसरत भी शामिल कर सकते हैं। आप वॉकिंग के दौरान ध्यान भी लगा सकते हैं।

आपके मन में यह विचार आ सकता है कि वॉकिंग में कसरत कहाँ है। मेरा अपना अनुभव है कि तेज वॉकिंग, जॉगिंग से ज्यादा परिश्रमी है यहाँ तक कि जब मैं तेज चलते हुए जॉगिंग में शिफ्ट होता हूँ तो काफी आराम मिलता है। विशेषतः युवाओं को अपने मन से यह बात निकालनी होगी कि वॉकिंग केवल बुजुर्गो का उद्यम है। हर उम्र का व्यक्ति इसे अपनाकर फायदा उठा सकता है। पर फायदा तभी है जब इसे नियमित रूप से रोज़ किया जाय। हमारे देश में मध्यम वर्ग में ग्रहणियाँ घर के सारे काम करती हैं पर फिर भी कुस्वास्थ्य से ग्रसित होती हैं। उनके लिए जरूरी है कि वे अपने लिए रोजाना कुछ समय निकालें और टहलने की शुरुआत करें। इससे न केवल सेहत बेहतर होगी, बल्कि और भी कई फायदे होंगे जिनपर आगे चर्चा की गई है।

आपको धीरे धीरे यह एहसास होगा कि इस उद्यम में कोई मंज़िल नहीं है। यह एक यात्रा है जिसमे आप समय के साथ आगे चलते हैं और अपने अनुभव और सीख के साथ आगे की यात्रा निर्धारित करते हैं। आप पाएंगे कि करीब एक महीने में आपको फायदा महसूस होने लगेगा। इस यात्रा में कई पड़ाव आएंगे जिसमें आप कोई टाइमिंग का टार्गेट, पतले होने का या वजन कम करने का टार्गेट हासिल करोगे। ये पड़ाव आपकी प्रेरणा बनेंगे और इस तरह टहलना आपकी आदत बन जाएगा।

नियमित टहलने से जुकाम और नजले मे शर्तिया सुधार आता है। वॉकिंग से मूड अपलिफ्ट होता है। अगर आप लो फील कर रहे हैं या टेंशन में हैं, तो उसमे भी आप बेहतर फील करेंगे। वॉकिंग से ब्लड प्रैशर और ब्लड शुगर में भी सुधार आता है। वॉकिंग से आपका पाचन ठीक होता है। टहलने के और भी बहुत फायदे हैं जैसे आप बीमार कम पड़ेंगे, दवाइयों पर निर्भरता कम होगी, बेहतर संगठित होंगे, आत्मनिर्भर होंगे, खाना एंजॉय करेंगे, इत्यादि। अपनी सेहत को बनाने के लिए कई लोग अपने आपको खान पान से वंचित करते है। मेरा अनुभव है कि अगर आप नियमित वॉकिंग करते हैं तो आपको स्वयं पर इतना कठोर होने की जरूरत नहीं है।

जब आप अकेले वॉकिंग करते हैं तो खुद से बात करने का अवसर बनता है। रोजाना की जिंदगी में आप कई समस्याओं से संघर्ष करते हैं। वॉकिंग के दौरान, खुद से बात करते हुए, आप कई बार पाएंगे कि वो समस्या वास्तव में इतनी बड़ी नहीं है।  कई बार वॉकिंग के दौरान उन समस्याओं को देखने का आपका नज़रिया बदल जाता है ओर कई बार आपको उस समस्या का समाधान भी मिल जाएगा।

वॉकिंग, सचमुच है न भानुमती का पिटारा।

नियमित टहलना न केवल आपकी रोजाना की जिंदगी में बेहतरी लाता है, मैंने देखा है कि जो लोग नियमित रूप से टहलते रहे हैं वे अपने अंतिम समय तक चलते फिरते रहते हैं। यानि ऐसे लोग मृत्यु से पहले समान्यतः बीमार नहीं पड़ते हैं। इस अवलोकन का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है और न ही यह किसी खोज पर आधारित है। यह मेरा व्यक्तिगत अनुभव है।

तो साथियों, जब टहलने के इतने फायदे हैं,  तो बेहतर जिंदगी हासिल करने के लिए एक कोशिश तो बनती है। हैप्पी वॉकिंग।