“सुई धागा” हिन्दी सिनेमा पर आधारित एक विचार मैं पहले भी आपके समक्ष रख चुका हूँ। इसी सिनेमा से प्रेरित एक दूसरा विचार रखना चाहूँगा। नायक गरीब है, और नौकरी छोड़ कर अपना सिलाई का काम शुरू करने की सोचता है। वह सरकार की मुफ्त सिलाई मशीन स्कीम में हिस्सा लेता है जिसमें समय सीमा के भीतर सिलाई का टेस्ट पास करने पर सिलाई मशीन मुफ्त मिलती है। जब सिलाई का टेस्ट होता है तो नायक किसी कारण से लेट हो जाता है। उसकी पत्नी जो सिलाई नहीं जानती है सिलाई का टेस्ट देने की कोशिश करती है पर असफल होती है। नायक किसी तरह बदहवास हालत में देर से पहुंचता है। जैसे ही वह पहुंचता है दोनों, एक नए उत्साह से, बिना देरी किए, टेस्ट देने में जुट जाते हैं और कम समय में भी टेस्ट पास कर लेते हैं और मशीन पा जाते है। यह टेस्ट उनके जीवन की दशा और दिशा दोनो को परिवर्तित कर देता है।
इसे देख कर, मुझे अपने साथ हुआ करीब 36 साल पुराना वाकया याद आ गया। तारीख थी 18 अगस्त 1982। मैं मुंबई, उस समय के बॉम्बे, में था। संघ लोक सेवा आयोग का इंजिनीरींग सर्विसेस का एक्जाम दे रहा था। इस दिन पाँचवाँ अर्थात आखिरी पर्चा था। मैं दादर में रहता था और हार्बर लाइन के सैंडहर्स्ट स्टेशन के पास परीक्षा स्थल था। मैं और मेरा एक साथी, हम दोनों दादर स्टेशन से लोकल ट्रेन से परीक्षा स्थल जाते थे। उस दिन जैसे ही दादर स्टेशन पर ट्रेन में बैठे, कुछ लोग आए उन्होने तोड़ फोड़ कर ट्रेन रोक दी। हम दोनों वहाँ से निकल कर बस में बैठे, पर कुछ दूर जाकर बस को भी रोक दिया गया। अब तक पता चल गया था कि पुलिस ने स्ट्राइक कर दी है और वो बॉम्बे बंद कर रहे हैं। बस छोडकर, टैक्सी लेकर जैसे तैसे परीक्षा स्थल पहुंचे। लेकिन जब तक वहाँ पहुंचे करीब आधा घंटा देरी हो चुकी थी। परीक्षा नौवे मंजिल पर थी। लिफ्ट के सामने पहुंचे तो लंबी लाइन थी। नौवी मंजिल तक दौड़ते हुए गए। अगस्त का महीना, बॉम्बे का मौसम, श्वासहीनता, पसीने से बुरा हाल और उस पर देरी का अहसास, हमारी ऐसी हालत देखते हुए निरीक्षक ने न केवल हमें परीक्षा देने की अनुमति दी, बल्कि पानी भी पिलाया। कुछ क्षण श्वास लेने के बाद, बिना कोई समय बर्बाद किए मैंने परीक्षा देना शुरू कर दिया। विपरीत परिस्थितयो में कम समय होने पर भी मैंने इस परीक्षा में काफी अच्छे अंकों से सफलता हासिल की।
इन दोनों वाकयों में सफलता का कारण सकारात्मक रवैया था। विपरीत परिस्थिति के बावजूद, मन में कोई शंका लाये बिना, अपनी क्षमता पर विश्वास करते हुए, परिस्थिति को स्वीकारते हुए, बिना कोई देरी किए, बचे हुए कम समय में काम पूरा करने का जज़्बा ही सफलता का कारण बने। देरी का कारण न मेरे हाथ में और न ही उस फिल्म नायक के हाथ में था, पर उस देरी से उत्पन्न हुई स्थिति से निपटना हमारे हाथ में था, जिसे हमने बखूबी किया। यही समय हम अगर देरी और उसके कारण के ऊपर ध्यान लगाने में करते तो निश्चित रूप से असफलता ही हाथ लगनी थी।
ज़िंदगी में ऐसी कई मौके आएंगे जब आपके काम या सफलता के आड़े बाहरी कारण आएंगे, जो आपके नियंत्रण से बाहर हैं। पर यह चुनाव आपको करना है कि आप इन बाहरी कारणों को दोषी ठहराते हुए अपना समय बर्बाद करें या इन पर ध्यान न देते हुए, जो आपके हाथ में है उसे करें। अगर आप बाहरी कारणों को जिम्मेदार मानेंगे, जो करना सबसे आसान है, तो आपको उस समय तो बहुत बेहतर महसूस होगा, पर इसका नकारात्मक पक्ष यह है कि इस मनोवृत्ति के साथ असफलता निश्चित है। अगर आप अपने चारों तरफ देखेंगें तो पाएंगे यही फर्क होता है शिकायती प्रवृति के लोगों में और कर्मठ लोगों में।
इन दो वाकयों के माध्यम से मैं यह विचार आपके लिए छोड़ना चाहता हूँ कि आप किस मनोवृत्ति के साथ अपनी ज़िंदगी में आगे बढना चाहेंगे – अपनी असफलता के लिए बाहरी कारणों को जिम्मेदार ठहराने की या विपरीत परिस्थितियों में भी स्वयं पर विश्वास करते हुए सफलता की और प्रयास करने की।